हर कहीं पत्थर

मैं एक लड़की को बहुत चाहता था
उससे बहुत बातें करता था
उससे सबकुछ शेयर करता था
सबकुछ मतलब सबकुछ

कई बार उसकी प्रतिक्रिया जाननी चाही
लेकिन वो कभी नही बोली
हर वक्त
हर बात पर चुप 
ऐसा नही की वो कुछ भी बोलती नही थी
वो भी सब कुछ बताती थी
उसका वर्तमान 
उसके सपने etc
मैं उसकी हर वक्त हर बात पर विश्लेषण करता 

बदले में चाहता कि
वो भी मुझे उसे जो ठीक लगे राह बताए
गलत पर डांटे भी

लेकिन

लेकिन वो कभी टस से मस नही हुई

आखिर में मैंने उसे कहा

की

मैं तुम्हे ईश्वर मानता था 
मैं तुम्हे ईश्वर मानता हूँ

और तुम सचमुच ईश्वर ही निकली
सच मुच का ईश्वर

मूक

जो केवल सुनता है
कभी बोलता नही 

तुम भी ईश्वर ही निकली
पूरी तरह पत्थर से बनी ईश्वर 

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