कभी सोचता हूं ...
मैंने अपने सबसे असुरक्षित क्षणों में जब-जब तुम्हें याद किया है
तब-तब यह सवाल आया कि बीतते समय के साथ मैं तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण रहूँगा कि नहीं!
संभव है, यह प्रश्न तुम्हारे ज़ेहन में भी उठता होगा
अपनी ओर से तुम्हें कहने के लिए मेरे पास बस इतना है कि हमारे आस-पास का समय बदले तो बदले,
पर तुम्हारा महत्त्वपूर्ण होना नहीं बदलेगा!
दूर होना,
पास होना या एक वक़्त तक रहकर ओझल हो जाना;
ये सब अवस्थाएँ हैं
तुम इन सबमें हो सकती हो या फिर इन सबके बाहर,
लेकिन तुम्हारा मुझमें होना इन सबसे अलग है
छोड़कर चले जाने वालों की भी उतनी ही बातें याद रहती है
अक्सर रोना यही सब सोचकर तो आता है
कोई भी किसी के लिए, अपना न पराया है
रिश्तों के उजाले में, हर आदमी साया है
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