अमृत
शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं,
मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं। मन की बातें लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ने जैसा है,
उधेड़ना अच्छा भी लगता है और आसान भी,
पर उधड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल है शायद.
जैसे सब कुछ ठहरा हुआ सा है वक्त अपनी धीमी चाल से चल रहा है ..
चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं मैं .. कुछ अजीब सा ठहराव सा है ज़िंदगी में ..
एक दूर तक फैली हुयी खामोशी .. पर दिल अशांत है .. क्यों सोच रहा हूँ क्या सोच रहा हूँ .. कुछ नहीं पता .. बस .. वक़्त के साथ चल रहा हूँ ..
कल जब वक़्त अपनी रफ्तार पकड़ लेगा तब भी मुझे शिकायत रहेगी ..
फिर अभी क्या है जो मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा ..
एक कसक है
एक बैचेनी है
बहुत कुछ घटते हुए देख रहा हूं
वो
जिसके बारे में बड़े बुढो से सुना था कभी
अब वो सब अपनी आंखों से देख रहा हूं
सुना तो बहुत कुछ खुशनुमा भी था
क्या वो पल भी आएंगे
क्या वो सब भी होगा जो लोगो की मुस्कान होगा
हर तरफ खुश लोग
एक दूसरे को देखकर खुश होते लोग
नाचते लोग
गाते लोग
अपने सपनो को सच करते
थिरकते लोग
खुद को कभी इतना थका हुआ महसूस ना किया जितना इन दिनों महसूस कर रहा हूँ..
सुकून की नींद की चाह में ना जाने कितनी रातो से जाग रहा हूँ..
मैं बिखरने लगा हूँ आजकल । अपने आप को बहुत सुलझा हुआ इंसान मानता आया हूँ,
लेकिन अब बहुत उलझने लगा हूँ कुछ समझ नहीं आता
घड़ी कि सुईयां अपनी रफ़्तार से चल रही हैं.... हर तरफ सन्नाटा बिखरा हुआ है...
लेकिन मैं बेचैन हूँ ...
मन में अजीब सी हलचल है ... मेरी जगह कोई और रहता तो बेशक चीख़ उठता......
Comments
Post a Comment