सुदर्शन जी

देर से उठा सूरज 
हड़बड़ा कर  
उसी आकाश  में निकल आता है    
जिसमें कल डूबा   था !


मनुष्य जीवन *तामसिक , राजसिक व सात्विक* तीन गुणों पर आधारित है
*पत्थर को हिलाओ या उछालो वह वापस जमीन पर गिरता है उसी प्रकार तामसिक लोग भी ऐसे ही स्थिर होते है उन्हें कोई कितना भी ऊपर उठाने की कोशिश करे वह फिर गंदगी में पहुंच ही जाते है क्योकि तामसिक गुण स्थिरता का प्रतीक है जो लोग नशे में लिप्त रहते है उन्हें कितना भी समझाओ या सम्मान दो वह नशे की गंदगी से मुक्त नही होते क्योकि उन्हें गंदगी पसंद है उसी गंदगी में उन्हें आनन्द प्राप्त होता है किंतु मनुष्य स्वभाव गंदगी से दूर रहते है जैसे दुःखो को कोई पसंद नही करता उनसे दूर रहता है उसी प्रकार तामसिक लोगो से भी लोग दूरी बनाए रखते है*
       *जिस प्रकार तामसिक गुण की प्रकृति है स्थिर रहने की , उसी प्रकार राजसिक गुण की प्रकृति है गतिमान रहने की , किसी पत्थर को अगर हम उछाल दे दो वह रुकने का नाम ही नही लेता है जैसे सुखों का होना व्यक्ति को उससे बाहर नही आने देता क्योकि सुख हर कोई चाहता है किंतु सिर्फ सुख ही जीवन मे मिलता रहे यह सम्भव नही क्योकि सुखों को पाने के लिए किए गए कर्मो में गलत कर्म , पाप कर्म भी शामिल हो सकते अर्थात कर्मफल दुःखो में परिवर्तित होकर जीवन मे स्थिरता ला सकता है इसलिए राजसिक सुखों का सीमित होना भी आवश्यक है वर्ना इसके कर्मफल हमे तामसिक बना सकते है*
    अर्थात तामसिकता से निकल कर राजसिक बनना और फिर तामसिक बन जाना *आदरणीय* यही वो प्रक्रिया है जिसे *हड़बड़ा कर सूरज का उठना* कहते है
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यह सुधार इस प्रकार चलता है तो *देर से उठा सूरज , हड़बड़ा कर* वाली लाइन को *नई रोशनी के साथ उदय होता सूरज* देखो *जीवन दर्शन देते हुवे नई उम्मीद के साथ अस्त हुवा* ऐसा लिखने पर *क्रमशः* यह सिख देता है
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    *तामसिक व राजसिक गुणों को जो संतुलित करते हुवे जो जीवन जीता है वह सात्विक जीवन कहलाता है यही कारण है कि मनुष्य दुःखो से उभरने के लिए अच्छे व सच्चे कर्म करता है जिसके फलस्वरूप उसे सुख प्राप्त होते है उन सुखों को बनाये रखने के लिये व्यक्ति सही गलत सभी प्रकार के कर्म करता है इसलिए फिर तामसिक हो जाता है इसलिए सुख व दुख को समभाव से देखने पर व कर्म करने पर सात्विक गुणो का जीवन मे उदय होता है यही सात्विक गुण जीवन को संतुलित करते हुवे सभी का प्रिय बनाता है*
*यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन मे संतुलन बनाने की कोशिशें करता रहता है अर्थात सात्विक बनने का प्रयास करता है ताकि जीवन को सही से जी सके
             तामसिक , राजसिक , सात्विक इन तीनो गुणों से भी मनुष्य ऊपर उठता है जो सामान्य व्यक्ति से उच्च जीवन की संभावना देखता है
*मनुष्य अवगुणों को दूर करते हुवे गुणों को धारण करता है जिसे देव गुणी कहते है*
देवगुणी अर्थात अच्छा आचरण करना
जो मानव मोक्ष चाहता है वही देवगणो से भी ऊपर उठता है *अर्थात* गुणातीत की ओर आगे बढ़ता है *अब सूर्य का अस्त होना एक नई उम्मीद में बदल जाता है* अन्य लोगो को उदय होते हुवे अस्त होने की तक कि शिक्षा देते हुवे *जो की जीवन का सत्य है*
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*जीवन मृत्यु के इस चक्र से प्रत्येक व्यक्ति बंधा है जिससे मुक्त होना सम्भव नही है*
   
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